उत्तराखंड की तीजनबाई- कबूतरी देवी

कबूतरी देवी का जन्म 18 जनवरी 1945 को काली कुमाऊं चंपावत में श्री रामकाली (पिता) के घर पर हुआ था। लोक गायन की प्रारंभिक शिक्षा इन्होने अपने पिता से ही ली थी जो कि उस समय के विख्यात लोक गायक थे।

कबूतरी देवी ने लोक गायन की प्रारम्भिक शिक्षा इन्होंने अपने पिता से ही ली। पहाड़ी गीतों में प्रयुक्त होने वाले रागों का निरन्तर अभ्यास करने के कारण इनकी शैली अन्य गायिकाओं से अलग है। विवाह के बाद इनके पति श्री दीवानी राम जी ने इनकी प्रतिभा को पहचाना और इन्हें आकाशवाणी और स्थानीय मेलों में गाने के लिये प्रेरित किया। उस समय तक कोई भी महिला संस्कृतिकर्मी आकाशवाणी के लिये नहीं गाती थीं। उन्होंने पहली बार उत्तराखंड के लोकगीतों को आकाशवाणी और प्रतिष्ठित मंचों के माध्यम से प्रचारित किया था। 1970-80 के दशक में नजीबाबाद और लखनऊ आकाशवाणी से प्रसारित कुमांऊनी गीतों के कार्यक्रम से उनकी ख्याति बढ़ी। उन्होने पर्वतीय लोक संगीत को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया था। उन्होने आकाशवाणी के लिए करीब 100 से अधिक गीत गाए।【 उन्हें उत्तराखंड की तीजन बाई कहा जाता है।】 जीवन के 20 साल गरीबी में बिताने के बाद 2002 से उनकी प्रतिभा को सम्मान मिलना शुरू हुआ। पहाड़ी संगीत की लगभग सभी प्रमुख विधाओं में पारंगत कबूतरी देवी मंगल गीत, ऋतु रैण, पहाड़ के प्रवासी के दर्द, कृषि गीत, पर्वतीय पर्यावरण, पर्वतीय सौंदर्य की अभिव्यक्ति, भगनौल न्यौली जागर,घनेली,झोड़ा व चाँचरी प्रमुख रूप से गाती थी।
उन्होंने अपने 20 साल अभावों में गुजारें, वर्ष 2002 में उन्हें नवोदय पर्वतीय कला केन्द्र, पिथौरागढ़ ने छोलिया महोत्सव में बुलाकर सम्मानित किया तथा लोक संस्कृति कला एवं विज्ञान शोध समिति ने उन्हें अल्मोड़ा में सम्मानित किया। इसके अलावा इन्हें पहाड संस्था ने भी सम्मानित किया। वे राष्ट्रपति पुरस्कार से पुरस्कृत थीं। उत्तराखण्ड का संस्कृति विभाग भी उन्हें प्रतिमाह पेंशन देता था। 2016 में 17वें राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर उत्तराखण्ड सरकार ने उन्हें लोकगायन के क्षेत्र में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से भी सम्मानित किया था

7 जुलाई 2018 को तीजन बाई का स्वर हमेशा के लिए मौन हो गया और वह बीमारी के चलते पंचतत्व में विलीन हो गयी।

देवभूमि कैरियर पॉइन्ट, उत्तराखंड

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